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गम न कर

गम न कर ऐ मेरी हमसफ़र वक़्त निकलेगा तो टीस थोड़ी कम होगी जख्मों की खीच थोड़ी नम होगी साँस लोगी तो आह नहीं निकलेगी रुकते क़दमों की आहट संभलेगी आँसू टपकेंगे तो तर जाओगी खुद अपने ही दुखों से उभर जाओगी गम न कर ऐ मेरी हमसफ़र अभी सोचती नहीं पर वक़्त ऐसा आएगा आसमान नीला होगा दिल बहल जाएगा फूलों में खुशबू होगी चेहरे पे नूर बातों में रंगत होगी आखों में सुरूर गम न कर हाथ पकड़ोगी तो दामन ना कोई छुडाऐगा साथ चलने को जमाना बहलाऐगा गम न कर दिल को भर दे तर दे रवानी से फिर बहाना नहीं आँसू कभी इस खुदगर्ज़ पे दर्द डूबेगा आज इसी तर्ज़ पे किस खुदा ने कहाँ है ज़िन्दगी ख़त्म करो एक शख्स पर ही बंदगी वरण करो दिल का मौसम है हरा होगा और अभी और अभी और अभी गम न कर ऐ मेरी हमसफ़र

तुम चलोगी?

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आओ आज हम दोनों इस बेमौसम बरसात में अपने अपने गम भिगो ले तुम अपनी सारी का एक कोना काट के फेक दो इस सुलगती आग पर जिससे कभी तुमने पोछे थे उसके आँसू मैं भी अपने दिल से निकालू उस भूली याद को जब उसने मुझे कातिलाना नज़रों से देखा था पहली पहली बार तुम भी दिल को नश्तर करती उस शिकायत से पूछो क्या तुमने भी कभी मुझे याद किया या मैं ही सुलगती रही रात भर उम्र भर मैं भी उस बूढी ईमारत के सूखे पेड़ से जा के पूछूंगा तुमने तो देखा था हमे क्या कमी रह गयी थी मुझमे क्यों मिल गए ये सूखे दिन ये भूली रातें मुझे सौगात में तुम भी कह दो उन हवाओं से ना उलझाये तुम्हारी जुल्फें यूं की उलझ जाती है तुम्हारी आरज़ू इन्ही जुल्फों की कैद में आओ आज सब गिले शिकवे यहीं इसी आग में भस्म करें इन हवाओं को बाँट ले आधा आधा इन बूंदों से पूछे एक नया रास्ता और एक नयी ज़िन्दगी का पता लिखे रेगिस्तान की मिटटी पर पानी के अक्षर से एक साथ तुम चलोगी ?